पाँव के छालों से पूछ.........

पाँव के छालों से पूछ.........
दर्द है हमारे पैरों में कितना, पाँव के छालों से पूछ ,
भूख क्या होती है ?भूखे बच्चो के निवालों से पूछ .
हम कामगार हैं, श्रम से अपनी किस्मत बनाते है ,
बदकिस्मती हमारी, तक़दीर पे लगे तालों से पूछ.
जीवन में है बदनसीबी की , आढी तिरछी रेखाएं
बाट निहारते घर मे, लगे मकडी के जालों से पूछ.
स्याहरात और दिन की तपिस में सड़क का सफ़र,
तन-मन मेरा कितना जला हैं ,सफ़र-वालों से पूछ .
कलेजा कितना विदग्ध होगा, टुकडे लाश देखकर,
गरीबों के परिवार माँ,बहन,बीबी के हवालों से पूछ,
कितनी हो रही हैं हद ,स्टेशन पहुँचते हैं पर ट्रेन रद्द,
कब चलेगी बुलेट ट्रेन,डिजीटल इंडिया वालो से पूछ .
परिवहन हमारा ही मंहगा था,चढ़ा राजनीतिक बली,
राहत से भी आहत, ये चालाकी कौवे-कालों से पूछ.
मेरी मेहनत की आब से रोशन और गुलज़ार शहर,
पर दुनिया मेरी कितनी अँधेरी,घर के उजालों से पूछ .
बेअसर हुई बेशर्म,संवेदनहीन मीडिया की मातमपुर्सी
मीडिया व टीवी चैनलौ के टीआरपी उछालो से पूछ।
गम गलत करने को या सरकारी खजाना भरने को,
खोले जा रहे जो गली गली ,उन मदिरालयों से पूछ.
कितना बिका है ईमान इंसानी ,इस बीमारी के दौर में,
हुई हैं कितनी दाल काली,सेठो ओर दलालों से पूछ.
शर्म भी है शर्मसार अब तो, घडियालो के राज में,
बहा रहे हैं जो नकली आंसू ,उन नक्कालो से पूछ.
हम तो गुमनामी में अच्छे थे, सुर्खियाँ तुमको मुबारक,
मचा रक्खा है खामखवाह बेमतलब के बवालो से पूछ.
बहुत मुश्किलों से नाता रहता है हमारा, सब सह लेगें,
एक बार तो याद कर झूठे वायदे ओर सवालों से पूछ.
छल करना सियासत का चलन हैं, बस यही जलन हैं,
वायदो पे भरोसा नहीं रहेगा, अब भौलेभालो से पूछ,
मंदिर मस्जिद चर्च और गुरुद्वारे ,बनेअमीरों के सहारे,
पूजे या ना पूजे ऊपरवाले,तू  भी बहुमतवालों से पूछ.
कुमार महेश (२७/०५/२०२०)
*व्यथित मन का सृजन*
pain of migrants,mazdur ka dard
mazdur ka dard

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